Wednesday, December 6, 2017


 शिकारी

दशकों पूर्व की
स्थितियाँ परिस्थितियाँ

जानी पहचानी
पुनर्जन्म सी
अपने जातिगत उभार में
आदिम प्रकृति का समकालीन पाठ करती हैं

घात में बैठा है हर एक शिकारी....

कोई फर्क नहीं
शिकार चाहे जानवर का हो
या इन्सान का ,
खून जानवर का बहे
या इन्सान का ,
कोई फर्क नही पड़ता

आखि़र....
आखेट की संतुष्टि भर कहानी ही तो है
शिकार और शिकारी
घात प्रतिघात
चलता परस्पर युद्ध

सतर्क बैठा है वो
खुद शिकार किये जाने के भय के साथ
कभी कभी दंश भी
उसको सतर्क किये रखता है

आईने में आईने झाँकते हैं -
और चेहरे !
चेहरे गायब
जटिल प्रश्न ?

अब कौन सवाँरेगा उन चेहरों को
गंभीर , नम्र, सादगी भरे चेहरों को
कौन पढ़ेगा
उनके हृदय की गीता -रामायण को,

शायद अब
प्रतिद्वन्द्विता में
नहीं सँवरेंगे चेहरे
ना साफ होगी आईनों की धूल

क्योंकि
परम सुख , इह लोक माया
चरम सुख है आखेट
होड़ है , बाजार में
कौन बनेगा सबसे बड़ा शिकारी,
जो समाज में ईनाम पायेगा
सिर उठाकर फक्र से जियेगा

मरने के बाद 

इतिहास लिखा जायेगा

           Pratibha Chauhan ...
आज का दिन

शताब्दियों ने लिखी है आज
अपने वर्तमान की आखिरी पंक्ति

आज का दिन व्यर्थ नहीं होगा
चुप नहीं रहगी पेड़ पर चिड़िया
खामोश रहेंगी
पेड़ों की टहनियाँ

प्यासी गर्म हवा संगीत को पियेगी
धरती की छाती ही फटेगी
अंतहीन शुष्कता में

मुरझायेंगे हलों के चेहरे
नहीं कुचली जायेंगी बालियाँ बर्फ की मोटी बूँदों से

बेहाल खुली चोंचों को
मिलेगी समय से राहत

नहीं करेगी तांडव नग्नता
आकाश गंगा की तरह ,

पीली सरसों से पीले होंगे बिटिया के हाथ
अबकी जेठ- घरभर,
आयेगा तिलिस्मी चादर ओढ़े ,

अब उड़ेगा , उड़ा ले जायेगा
चेहरों के रंग
आँखों के सपने ,
दिलों की आस,

भर देगा आँखों में चमक
आँखों से होता हुआ आँतों तक जायेगा

बुझायेगा पेट की आग ये बादल

आज के वर्तमान में।

Pratibha Chahuhan ...
मानवीयता एक नैतिक आग्रह

मानवीयता
एक नैतिक आग्रह है,
संघर्ष की जिजीविषा है...

अभिषप्त दायरों को तोड़ती दुनिया पत्थरों की तरह
विद्रूपता और मिथकीयता में
सभ्यता विमर्ष
बस, बौद्धिक स्वर भर

बदलाव की खाई भरने के लिये
त्र्मृण की लिपि व स्याही सूख चुकी है
अब बंद करो देवताओं के गान
चीत्कारों मे मत ढूँढो संगीत

नई कलम तराशकर लिख जाने दो
स्वाभाविकता का प्रेम संदेश

क्योंकि अब न राजा है
न प्रजा

न साम्राज्य ।
 Pratibha Chauhan ...

नियति

काला बादल निगलने की फिराक में है....
नीला आसमान
लाल सूरज
हरी धरती
पर हजार बृह्माण्डों की ताकत भी
असफल रही नियति को निगलने में।



                   Pratibha Chauhan ......

Thursday, October 13, 2016



           वो अपने हैं



मेरा आंखों से ढलकना
व्यर्थ है
गर तुम्हारे दिल की गहराई में
कोई आवाज न हो
बदल जाते हैं हर्फ़ किताबों के भी
दिल में शिद्दत से
जज्बातों का तूफान जो हो
बेकार है सारी दुनिया के रिश्ते
जिन की तर्ज पर होती हैं सियासत की बातें
जिससे चलते हैं सारी दुनिया के व्यापार
एक धागा काफी है
विश्वास का ,
पिरोने को प्यार  के अल्फाज जितने हैं
कबूतरों  के पांव
कभी बांधे नहीं समय ने
उड़ जाते हैं  वो परिन्देे हैं
जो लौट आये हैं वो अपने हैं…

गजल संग्रह- “तुम भी नहीं’’ - श्री अनिरुद्ध सिन्हा

              गजल संग्रह- “तुम भी नहीं’’                           ( गज़लकार - श्री अनिरुद्ध सिन्हा)            पृष्ठ -104...